रविवार, 30 मार्च 2008

हूँ.....लो हो गया एनकाउण्‍टर कर दिया शॉट डेड साले को

हास्‍य/व्‍यंग्‍य

हूँ.....लो हो गया एनकाउण्‍टर कर दिया शॉट डेड साले को

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ''आनन्‍द''

शहर ए आजम इन दिनों तफरी पर हैं, उनका स्‍टाफ आजाद इन दिनों पूरी आजादी और लोकतंत्र का आनन्‍द ले रहा है । साहब के कार्यालय में इन दिनों मार्च क्‍लोजिंग चल रहा है, साहब को हुकुम मिला कि बजट पूरा निबटाना है, एक पाई भी सरैण्‍डर नहीं होनी चाहिये । निपटाओं कैसे भी कहीं भी ।

साहब और साहब के सैनिक हर साल कुछ पैसा सरैण्‍डर कर लौटाने के आदी थे और बजट सरैण्‍डर करना तथा पैसा वापस सरकार को भेजना उनकी सालानाचर्या का अहम भाग थी । वे इसे सरकारी पैसे की बचत मानते आये थे । पैसा लौटा कर छाती ठोक के सीना तान के अपनी तारीफ में खुद ही कशीदे बॉंच लिया करते थे ।

अबकी बार ससुरी मुसीबत हो गयी, सब उल्‍टा हो गया गुल गपाड़ा हो गया । ऊपर से आदेश हैं सरैण्‍डर नहीं एनकाउण्‍टर चाहिये, वापसी नहीं उपयोगिता प्रमाण चाहिये ।

रटी रटाई लाइनों पर ट्रेडीशनलीया स्‍टाइल में काम करने वाले सरकारी कार्यालय नये किस्‍म के आदेश से चक्‍कर में पड़ गये । सरकारी बचत की जगह अब सरकारी खपत में सरकारी खुपडि़या दौड़ा दौड़ा कर बेहाल हो गये मगर ससुरा बजट था कि जित्‍ता खर्च करो बढ़ता ही जाता था ।

ऑफिस के बाबूओं के चकरघिन्‍नी हो जाने के बाद भी जब बजट का निकाल ( यह सरकारी शब्‍द है) जब पल्‍ले नहीं पड़ा तो साहब से मार्गदर्शन चाहा गया, साहब ने मोबाइल से मार्गदर्शन दिया, कि पहले लिस्‍ट बना लो कि अपने ऑफिस में क्‍या क्‍या होता है, और उसमें क्‍या क्‍या सामान लगता है या क्‍या क्‍या खर्च होता है फिर उसके सामने खर्चा डालना शुरू करो ।

बाबूओं ने साहब के निर्देशानुसार लिस्‍ट बनाना शुरू की, लिस्‍ट बनी तो ठाकुर साहब द्वारा हवन के लिये लिखाई जाने वाली सूची की तरह बन गयी । अब इस लिस्‍ट में खर्चा डालने का काम शुरू हुआ, सारे खर्चे डालने के बाद भी बजट फिर भी एनकाउण्‍टर नहीं हुआ, फिर सरैण्‍डर हुआ जा रहा था, बाबूओं ने फिर ऊपर से मार्ग दर्शन चाहा, ऊपर से मोबाइल पर आकाशवाणी स्‍टायल में साहब फिर भगवान कृष्‍ण की तरह मुस्‍कराते हुये उवाचे कि ऐसा करो कि मनमानी रकम भर दो, बाबू अर्जुन के मानिन्‍द घिघियाये कि साहब पहले से हम 400 के 3400 और 700 के 70000 लिख लिख कर रखे हैं पर फिर भी साला सरैण्‍डर कर रहा है अब कैसे एनकाउण्‍टर करें ।

साहब ने गीता के सोलहवें अध्‍याय के कृष्‍ण के मानिन्‍द कहा कि आसुरी सम्‍पदा से काम नहीं चल पा रहा तो दैवीय सम्‍पदा भी शामिल कर लो, फिर भी बात न बने तो सत्रहवें अध्‍याय वाले त्रय गुण विभाग कर लो, बाबूओं ने फिर अफसर से मार्गदर्शन चाहा और कहा प्रभो आपकी बातें कुछ समझ नहीं आ पा रहीं, अगर हिन्‍दी में बतायें तो शायद समझ में आ जाये । या फिर मुरैना के अंग्रेजी स्‍कूलों वाली इंग्लिश स्‍टायल में बता दें तो कुछ पल्‍ले पड़ जाये ।

अफसर मोबाइल वाली आकाशवाणी पर फिर कृष्‍ण स्‍टाइल को छोड़ मुरैना के अंग्रेजी स्‍कूलों के टीचर स्‍टाइल में अपनी व्‍याख्‍या सुनाने लगे और बोले, ऐसो करियो जित जित में कोमा लगे होयं तहॉ तहॉं ऐसी ऐसी मद डार दियो तिनके प्रूफ न होतई, और दो चार दिना बाद डिलीट हे जातें । जैसें दीवाल की लिखाई हर महीना के खच्‍च में एण्‍ट्री कर देओ, दीवाल की लिखाई हप्‍ता आठ दिना में मिटरत रही, हम लिखवावत रहे, ऐसेंई लिखीयो हमने भोंपू बजवाये प्रचार के काजें, रिक्‍शान में लाउडस्‍पीकर धरकें बजवाये, गामन में ऐलान करवाये, नास्‍ता फास्‍ता डीजल फीजल सिग डार डूर के देखो अब तिहाई बैलेन्‍स सीट का कहि रही है, फिरऊ बचें तो पेड़ पौधा लगाइबो दिखाय दीयो, कोऊ स्‍पष्‍टीकरण आवे तो कहि दीयो हमने तो लगाये हते, अब गैया भैंसे चर गयीं तो का करें । और बिनकी जाली को खच्‍च डारों तो लिख दीयो के पानी नहीं परो सो सूख साख गये, अबऊ कछु खच्‍च बच परे तो फैक्‍स में और फोनन में दिखाय दीओ, जे सिग कर करू के फिर हमें फोन लगाय लीयो, दूसरे नम्‍बर पे लगईयो, जा नम्‍बर को हम बन्‍द राखेंगे, पबलिक डिस्‍टरब करति है । काऊ को पानी ना आय रहो, काऊ की बिजली नाने तो काऊ की गली में सफाई ना हे रही, अब हम झाड़ू लेके जायें का, सिगुई देस परेसान है, कौन कौन की सुनें सो वा नम्‍बर की सिम खेंच देत हैं ।

बाबूओं ने साहब की समझाइस के अनुसार फिर से बजटिंग का एनकाउण्‍टर करना शुरू किया, फिर भी बजट था कि सरैण्‍डर कर रहा था । हैरान परेसान बाबूओं ने आखिर खेंच के दारू का मद भी चढ़ा दिया, साहब की डेली इत्‍ती, बाबूओं ने इत्‍ती और आने जाने वाले अतिथियों ने इत्‍ती और रोज टाइमपासीयों ने इत्‍ती पी ......। आखिर जब हिसाब लगाया तो अब न केवल बजट एनकाउण्‍टर हो गया बल्कि शॉट डेड हो गया, बल्‍कन ओवर बजट हो गया ।

मार्च क्‍लोजिंग हो गया, अब जब साहब पर्सनल टूर से लौटेंगे तो पीठ ठोकेंगे वाह भई वाह, हूं साला बार बार सरैण्‍डर कर रहा था, कर दिया एनकाउण्‍टर हो गया शॉट डेड । निबट गया गड़रिया की तरह, जादा ही अति धर रखी थी ।

मंगलवार, 25 मार्च 2008

वरिष्ठ नागरिकों के लिए आयुर्वेद

वरिष्ठ नागरिकों के लिए आयुर्वे

21वीं सदी में जीवन की संभाव्यता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। कुछ दशक पहले विश्वभर में रूग्णता और मौत के खिलाफ संघर्ष में संचारी रोगों के उपचार और रोकथाम पर अधिक ध्यान दिया जा रहा था। किंतु, आज गैर-संचारी रोगों के उन्मूलन पर अधिक जोर दिया जा रहा है। वरिष्ठ नागरकिों में मृत्यु के प्रमुख कारणों में श्वसन संबंधी समस्याएं, हृदय रोग, कैंसर और पक्षाघात जैसी बीमारियां शामिल हैं। इस आयु-समूह के व्यक्तियों में रूग्णता के प्रमुख कारणों में क्रोनिक इन्फ्लेमेट्टी (पुरानी सूजन) और डीजेनरेटिव (विकृति) स्थितियां शामिल हैं, जैसे अर्थराइटिसद्व, मधुमेह, ऑस्टिओपोरोसिस (अस्थि रोग), अल्जेमर रोग, डिप्रेशन, मनश्चिकित्सीय विकृतियां (साइकिएट्रिक डिस्ऑडर्स), पार्किसन्स और आयु संबंधी मूत्र रोग।

जरा-चिकित्सा समस्या के समाधान में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ज्यादातर मामलों में रोग-स्थिति का केवल एक कारण नहीं होता अथवा कुछ न्यूरो-साइकिएट्रिक विकृतियों, जैसे सेनाइल डेमेंटिया, अल्जेमर डिप्रेशन में बुनियादी संरचनागत कारण का पता नहीं चलता। ऐसे मामलों में परंपरागत चिकित्सा (मेडिकल) पध्दति उपचार योजना में विफल रहती है। परंपरागत चिकित्ससा पध्दति के समक्ष एक अन्य चुनौती यह रहती है कि इसमें स्वास्थ्य को प्रोत्साहन देने वाले एजेंटों (तत्तवों) का अभाव रहता है। दूसरी ओर आयुर्वेद में चवनप्रास, त्रिफला जैसी दवाएं हैं, जो शारीरिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा देती हैं, जिनसे मेटोबोलिक और रोगप्रतिरक्षण स्थिति पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। ये दवाएं जरा-चिकित्सा के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

रसायन उपचार पध्दति

आयुर्वेद के अंतर्गत रसायन उपचार पध्दति एक ऐसा प्रतिबव्ध्द उपाय है, जो रोगप्रतिरक्षण क्षमता को बढ़ाता है तथा विकृतिमूलक और पुन:स्फूर्तिदायक स्वास्थ्य देखभाल में मददगार है। यह पध्दति बढ़ती उम्र के दुष्प्रभावों को रोकने में सक्षम है और साथ ही स्वस्थ एवं रूग्ण, दोनों ही व्यक्ितियों के स्वास्थ्य में सुधार लाती है। वैज्ञानिक अध्ययनों से जीवन शैली संबंधी पुरानी बीमारियों और विकृतिजन्य परिवर्तों के प्रबंधन में रसायन उपचार की भूमिका की प्रभावोत्पादकता प्रमाणित की जा चुकी है।

विकृतिजन्य रोग पुरूषों और महिलाओं दोनों में ही 45 वर्ष की आयु से प्रांरभ होते हैं। इसी अवस्था में रसायन के सेवन की सलाह दी जाती है। आयुर्वेद जैसी समग्र प्रणाली में इस अवस्था में दो-तरफा पध्दतियों से उपचार का प्रयास किया जाता है। पहली पध्दति में अतिवादी दृष्टिकोण अपनाया जाता है, जिसमें कुटिप्रवीशिका रसायन के नाम से विख्यात तीन-चार महीने की कड़ी एवं सुनियोजित प्रक्रिया के माध्यम से शरीर से विषाक्त तत्वों को निष्कासित करके समूची मैटोबोलिक प्रक्रिया (चयापचय प्रणाली) को पुनर्भरित किया जाता है। इस पध्दति में शारीरिक प्रक्रिया की जटिलताओं को देखते हुए, इसका इस्तेमाल कभी नहीं किया जाता। इसमें चिकित्सक की कड़ी देख-रेख और उपचार के वातावरण की भी अहम भूमिका होती है। इस तरह कुटिप्रवीशिका आयुर्वेद का सैध्दांतिक रत्न मात्र है और समसामयिक व्यवहारिक प्रक्रिया में वह प्रासंगिक नहीं लगती है।

आयुर्वेद की दूसरी पध्दति, जो आज अत्यन्त लोकप्रिय है, वातातपिका रसायन है-जिसका प्रयोग रोजमर्रा के जीवन में किया जा सकता है। इस तरह के रसायन आज के परिदृश्य में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनके प्रयोग में आसानी रहती है और किसी प्रकार की प्रतिबंधात्मक पूर्व-शर्तें नहीं है।

रसायन के प्रभावों का उल्लेख करते हुए, आयुर्वेद के शास्त्रीय ग्रंथों में बताया गया है कि रसायन से व्यक्ति को दीर्धायु, परिष्कृत सामंजस्य और बुध्दि प्राप्त करने, विकृतियों से मुक्ति, यौवन पूर्ण उत्साह, जीजीविषा, रूप-रंग और अवाज, अनुकूलतम शारीरिक और बौध्दिक शक्ति, भाषा पर अधिकार, प्रतिष्ठा एवं उत्कृष्ठत जैसी उपलब्धियां हासिल होती हैं। आयुर्वेद में यह माना गया है कि शरीर की संरचना सात धातुओं से मिलकर हुई है, जिसकी शुरूआत रस (रसादि धातुएं) से हाती है और रसायन वह उपकरण है जो प्रमुख धातुओं (शरीर ऊतकों) का निर्माण करते हैं। रसायन पध्दति की प्रमुख उपयोगिता यह है कि यह कार्यात्मक एवं पुरानी या दीर्धावधि से चली आ रही विकृतियों को दूर करती है। वास्तव में ऐसे मामलों में रसायन किसी भी चिकित्सा पध्दति के प्रभावकारी प्रबंधन के लिए एकमात्रा समाधान है। यदि उपयुक्त पंचकर्म (पवित्रीकरण चिकित्सा पध्दति) अपनाने के बाद रसायन पध्दति अपनायी जाती है तो अधिक उपयोगी और अधिक असरदार सिध्द होती है। इसका कारण यह है कि रसायन के उपयोग के कई मामलों में मिल-जुले नतीजे सामने आते हैं। उनमें पवित्रीकरण पध्दति या तो अपनायी नही जाती अथवा अनुपयुक्त ढंग से अपायी जाती है।

पंचकर्म

पंचकर्म एक जैनिक-स्वच्छता प्रणाली है, जिसमें पांच प्रमुख प्रक्रियाएं शामिल हैं, जिन्हें अंजाम देने से औषध-वैज्ञानिक (फार्मा कालॉजिकल) चिकित्सा पध्दतियों की बेहतर जैव-उपलब्धता में मदद मिलती है, बीमारी पैदा करने वाली जटिलताएं शरीर से दूर होती हैं और बीमारी के पुन: जन्म लेने या बढ़ने पर अंकुश लगता है। इस चिकित्सा पध्दति की पांच प्रक्रियाएं इस प्रकार है: वामन (थरपेटिक एमेसिस), विरेचन (थरपेटिक पर्गेशन), अस्थापन वस्ति (थरपेटिक ऑयल एनिमा), नास्य कर्म (नाक से औषधि लेना)।

पंचकर्म प्रक्रियाओं से स्नेहाना (थरप्यूटिक ऑलिएशन) और स्वेदाना (सूडेशन) जैसे अनुप्रयोग किए जाते हैं ताकि शरीर प्रणाली को बॉयो-टॉक्सिन (जैविक विषाक्तता) की समाप्ति और सरणियों की सफाई के लिए तैयार किया जा सके। ये अनुप्रयोग स्वत: प्रतिरक्षण, न्यूरोलॉजिकल, साइकिएट्रिक और पुराने तथा मेटाबोलिक मूल के मस्कुलो-स्केलेटल रोग के उपचार में कारगर सिध्द होते हैं।

वास्तव में आर्युवेद का उपचार व्यक्तिगत किस्म का है और यह संभव है कि किसी स्थिति में व्यक्ति विशेष के लिए उपयोगी समझी गयी चिकित्सा अन्य व्यक्ति के मामले में उतनी कारगर सिध्द न हो। अत: चुनौती यह है कि किसी एक स्थिति के लिए सामान्यकृत प्रबंधन समाधान विकसित किए जायें, जो सभी के अनुकूल हो। किसी रोग स्थिति के लिए प्रबंधन योजनाएं तैयार करना और उसे बड़े पैमाने पर अमल में लाना अत्यंत कठिन कार्य है। महत्वपूर्ण बात यह है कि हम परंपरागत चिकित्सा की समग्रता और आधुनिक बॉयोमेडिसन के एकांगीपन दोनों का सम्मान करें क्योंकि वे दोनों ही प्रकृति को देखने के तरीके हैं। प्रयोजन के अनुसार ये दोनों तरीके अत्यंत उपयोगी हो सकते हैं। इतना ही नहीं सम्पूर्ण और अंश के बीच निश्चित रूप से सम्बन्ध होता है। लेकिन वह आमने-सामने का सम्बन्ध नहीं है।

यह समझने के लिए कि सम्बन्ध आमने-सामने का नहीं है और यह अध्ययन करने के लिए कि सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य (यानी आयुर्वेद एवं योग के व्यवस्थित सिध्दांतों) के साथ आंशिक (यानी पश्चिमी बॉयो मेडिसिन के संरचनागत सिध्दांतों) को कैसे जोड़ा जाये, आवश्यकता इस बात की है कि अंतर-विषय अनुसंधान परियोजनाओं को लागू किया जाये। आज शैक्षिक जगत में किसी के पास भी सभी सवालों के उत्तर नहीं है कि किस तरह अंश को सम्पूर्ण के साथ संयुक्त और सम्बध्द बनाया जाये। क्लिनिकल अनुसंधान डिजाइन, क्लिनिकल प्रैक्टिस, आयुर्वेद और योग सम्बन्धी पाठयक्रमों, औषधि विज्ञान में प्रयोगशाला अनुसंधान और उत्पाद विकास जैसे संदर्भों में दोनों पध्दतियों के संयुक्त अध्ययन और समुदाय आधारित स्थानीय स्वास्थ्य पध्दतियों के मूल्यांकन की आवश्यकता है।

वर्ष 2050 तक विश्व में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या अधिक होगी। 65 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति विश्व की आबादी का पांचवा हिस्सा होंगे। भारत में आबादी का 3.8 प्रतिशत हिस्सा 65 वर्ष से अधिक आयु का है। एक अनुमान के अनुसार 2016 तक भारत में वरिष्ठ नागरिक करीब 11 करोड़ 30 लाख के आसपास होंगे।

आयुर्वेद के माध्यम से जराचिकित्सा के सम-सामयिक अनुप्रयोग में सबसे बड़ी चुनौती लिखित समझौते तैयार करने, एकीकृत ढांचे की पहचान करने और जराचिकित्सा की ऐसी समस्याओं का समाधान करने की होगी, जिनके लिए अत्याधुनिक अनुसंधान, उपचार और शिक्षण केन्द्रों में महत्वपूर्ण निवेश अपेक्षित होगा। इन संस्थानों में जराचिकित्सा के लिए अत्याधुनिक सुविधाएं होंगी। यह उनिवार्य है कि बहुआयामी उपायों पर विचार किया जाये जो क) अंतरविषयी अनुसंधान, ख) अत्याधुनिक उपचार केन्द्रों और ग) विशेषज्ञतापूर्ण स्नातकोत्तर शिक्षा पर बल दे सकें। देश में ऐसे केन्द्र स्थापित करने की तत्काल आवश्यकता है जो आयुर्वेद को वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाने के लिए अंतरविषयी अनुसंधान में संलग्न हों और आयुर्वेद की उपचारात्मक सेवाओं को मुख्य धारा में ला सकें। ऐसे अनुसंधान के लिए उदार वित्त व्यवस्था आवश्यक होगी और साथ ही ऐसे केन्द्र स्थापित करने होंगे जो प्रभावकारी उपचारात्मक सेवाएं प्रदान कर सकें। जराचिकित्सा से सम्बध्द स्नातकोत्तर अध्ययन केन्द्रों में विशेषज्ञतापूर्ण अंतरविषयी स्नातकोत्तर अनुसंधानकर्ताओं को सहायता देने की आवश्यकता होगी।

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स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार से मिली जानकारी पर आधारित

 

सोमवार, 24 मार्च 2008

एयरटेल फिर फेल, आटोमेटिक डिएक्टिवेट हुये मोबाइल आफिस, शिकायतें भारत सरकार तक हुयीं

एयरटेल फिर फेल, आटोमेटिक डिएक्टिवेट हुये मोबाइल आफिस, शिकायतें भारत सरकार तक हुयीं

भोपाल/ मुरैना 25 मार्च 08, उपभोक्‍ताओं के शोषण में लगी निजी कम्‍पनीयों की हालत क्‍या है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर दूसरे तीसरे रोज लड़खड़ाने वाली भारती एयरटेल की सेवाओं में कल 24 मार्च को करिश्‍माई तरीके से कुछ विशेष नंबर की सिमों से अपने आप ही मोबाइल आफिस नामक सेवायें डिएक्टिवेट हो गयीं । (अधिकतर यह नंबर वे हैं जो जागरूक उपभोक्‍ताओं के हैं और नियमित रूप से सक्रिय होकर कम्‍पनी की शिकायतें करते आये हैं ) इन उपभोक्‍ताओं द्वारा सेवायें डिएक्टिवेट कराने हेतु न तो कोई अनुरोध ही किया और न कोई एस.एम.एस. ही भेजा था, लेकिन सेवा में त्रुटि के चलते एयरटेल फेल हो जाने से उनकी सेवायें स्‍वत: निष्क्रिय हो गयीं ।    

जब उपभोक्‍ताओं द्वारा एयर टेल के कस्‍टमर केयर पर इस सम्‍बन्‍ध में शिकायतें कीं तो पहले तो कस्‍टमर केयर वाले इसका कोई संतोषजनक उत्‍तर ही नहीं दे सके । फिर भी लोगों को आश्‍वासन देते रहे आपका मोबाइल आफिस अभी आधा घण्‍टे में या फिर अन्‍य कर्मचारी ने दो घण्‍टे में तो किसी अन्‍य कर्मचारी ने इसे चार घण्‍टे में रिएक्टिवेट करने का झांसा देते रहे । लेकिन आज सुबह समाचार लिखे जाने तक मोबाइल आफिस की सुविधायें दिन और रात गुजरने के बाद भी रिएक्टिवेट नहीं हुयीं थीं ।

परेशान उपभोक्‍ताओं ने देर रात अन्‍य कम्‍पनीयों की सेवाओं के जरिये भारत सरकार के संचार मंत्रालय को एवं उपभोक्‍ता मंत्रालय को अपनी शिकायतें ई मेल द्वारा भेजीं हैं । साथ ही कम्‍पनी व सरकार को नोटिस भेजा है । अब देखना है कि सरकार इस सम्‍बन्‍ध में क्‍या कदम उठाती है ।  

ताजा जानकारी के अनुसार यह सेवायें उन नंबरों पर गड़बड़ाई गईं जिन पर कल ही रिचार्ज कराया गया । मजे की बात यह रही कि रिचार्ज से पहले चालू सेवायें रिचार्ज कराने के बाद बन्‍द यानि निष्क्रिय हो गयीं ।

जब उपभोक्‍ताओं ने इसे पुन: सक्रिय कराने के प्रयास किये तो लो बैलेन्‍स के संदेश के साथ डिनायल आफ सर्विसेज की स्थिति में एयरटेल आ गया । यह क्रम आज सुबह समाचार लिखे जाने तक जारी था । गलत और सरासर गलत संदेश (लो बैलेन्‍स) के इस प्रकार पुनरूत्‍तर में प्राप्‍त होकर डिनायल आफ सर्विसेज की इस स्थिति से अनेक उपभोक्‍ता हैरत में हैं ।  

उपभोक्‍ताओं ने बताया कि अभी उनके द्वारा भारत सरकार के दोनों सम्‍बन्धित मंत्रालयों में अपनी शिकायत जमा करा दी है , आगे सुधार न होने की दशा में न्‍यायालयीन कार्यवाही की जायेगी, तथा कम्‍पनी से हर्जाने की मांग की जायेगी ।     

 

फिर ठप्‍प हुयी एयरटेल की इण्‍टरनेट सेवायें, 20 दिनों के दरम्‍यां 13 वीं बार एयरटेल फेल

नहीं सुनी जातीं एयरटेल कस्‍टमर केयर पर उपभोक्‍ताओं की शिकायतें

भोपाल/मुरैना 20 मार्च 08, देश की आवाज बनने का दावा और उपभोक्‍ताओं को बेहतरीन सेवायें देने का दावा करने वाली देश की ऊंची दूकान भारती एयरटेल की सेवायें पिछले 20 दिनों के दरम्‍यां आज फिर 13 वीं बार फेल हो गयीं ।

लैण्‍ड लाइन और वायरलेस तथा मोबाइल के जरिये इण्‍टरनेट सेवायें मुहैया कराने के कम्‍पनी के खोले दावों की कलई इसी बात से खुलती है कि जहॉं सरकिट अनुपात 1:6 से अधिक नहीं होना चाहिये वहॉं एयर टेल का सरकिट अनुपात लगभग सौ गुना अधिक है ।

लगभग हर तीसरे दिन फेल हो जाने वाला एयरटेल का इण्‍टरनेट केवल लैण्‍ड लाइन उपभोक्‍ताओं के लिये ही समस्‍या हो ऐसा नहीं है । इस कम्‍पनी के वायरलेस और मोबाइल इण्‍टरनेट उपभोक्‍ताओं की हालत तो और अधिक खस्‍ता है ।

मोबाइल और कम्‍प्‍यूटर पर वेबसाइटों का न खुलना, कनेक्टिविटी आमतौर पर न होना पीपीपी लिंक डिस्‍कनेक्‍शन, कनेक्‍शन गति .033 से 1.2 के.बी.पी.एस. तक गिर कर कनेक्‍शन चलना एयरटेल उपभोक्‍ताओं के लिये आम बात है । आप न ई मेल भेज सकते हैं और न प्राप्‍त कर सकते हैं ।

 मजे की बात यह है कि आप कस्‍टमर केयर पर नंबर लगाते रहिये, पहले लगभग 20 मिनिट आपको ये दबाईये वो दबाईये में घुमा घुमा कर हुड़कचुल्‍लू बना दिया जायेगा उसके बाद या तो शराब में धुत्‍त कोई महानुभाव सीधे सपाट शब्‍दों में कह देंगें कि श्रीमान आपने गलत नंबर लगाया है आप 12121 लगाईये, आप कहेंगे कि हमने 12121 ही लगाया है तो वे कहेगें कि नहीं गलत है आप फिर लगाईये, आप फिर आधे घण्‍टे संघर्ष करिये और फिर या तो नंबर की घण्‍टी बज बज कर बन्‍द हो जायेगी या फिर कोई महानुभाव उभरेंगे और कहेंगें श्रीमान आपके सेट की सेटिंग गलत हैं या फिर आपके कम्‍प्‍यूटर में भारी गड़बड़ है, गोया अन्‍तर्यामी महाराज को वहीं से पता लग जाता है कि यहॉं किलोमीटरों दूर क्‍या गड़बड़ है । पठ्ठो को बताईये कि नहीं श्रीमान हम चार महीने से जिस सेटिंग पर चला रहे हैं, वही सेटिंग है, तो फिर कहेगे ठीक है आप इस नंबर को दोबारा लगाईये आपकी बात टेक्‍नीकल सेक्‍शन से होगी, वे आपकी समस्‍या समाधान करेंगे ।

आप फिर आधे घण्‍टे जूझिये फिर कोई महानुभाव या सुन्‍दरी प्रकट होगी और बोलेगी, सर हमारा नेटवर्क इस समय डाउन चल रहा है कृपया चार घण्‍टे बाद ट्राई करें ।

आप इसी तरह इन्‍तजार करते रहिये, सारा सारा दिन सारी सारी रातें यूं ही गुजारते रहिये, आपके तीन दिन बीत जायेंगे, फिर अपने आप कनेक्‍शन काम करने लगेगा । फिर एक या दो दिन कनेक्‍शन चलने के बाद इतिहास फिर अपने आपको दोहराने लगेगा ।

एयरटेल की दुर्दशा से दो चार होने वाले उपभोक्‍ताओं ने बताया कि जब ऊपर के किसी अधिकारी का नंबर मागा जायेगा तो उपलब्‍ध ही नहीं कराया जाता, ऊपर के अधिकारीयों के नंबर एयरटेल की वेबसाइट तक पर उपलब्‍ध नहीं हैं । न किसी वरिष्‍ठ अधिकारी का ई मेल पता ही पृथक से वेबसाइट पर उपलब्‍ध है , और जो कॉमन शिकायती नंबर तथा ई मेल पते या एस.एम.एस. नंबर दिये गये हैं, उन पर कभी कोई कार्यवाही नहीं होती । या तो शराब में धुत्‍त लो कस्‍टमर केयर पर बैठे उल्‍टी सीधी बातें करके ग्राहकों को मूर्ख बनाते रहते हैं या फिर झूठे वायदों और आश्‍वासन के जरिये टाइम पास करते रहते हैं ।

सबसे अधिक नुकसान उन उपभोक्‍ताओं का होता है जिन्‍होंने दस रूपये प्रति दिन या लैण्‍डलाइन के असीमित उपयोग के प्‍लान ले रखे हैं, महीने भर में वे बमुश्किल तीस दिनों में से दो या तीन दिन का औसत उपयोग कर पाते हैं, शेष समय येन केन प्रकारेण कनेक्‍शन डिस्‍टर्ब या ठप्‍प ही रहता है । लगभग साठ-सत्‍तर उपभोक्‍ताओं द्वारा हमारे कार्यालय में की शिकायत में बताया है कि उनका मासिक प्रभार या दैनिक प्रभार तो नियमित रूप से एयरटेल द्वारा वसूला जाता है लेकिन सेवाये केवल वायदे और वसूली के विरूद्ध महज दस फीसदी ही दी जातीं हैं ।

भारत सरकार द्वारा, नामी कम्‍पनीयों की सेवाओं की नियमित व गुप्‍त जॉंच न किये जाने से देश में संचार कम्‍पनीयों द्वारा किये जा रहे उपभोक्‍ताओं के भारी शोषण और ठगी को रोके जाने की अभी तक कोई कारगर व्‍यवस्‍था नहीं हैं । इन कम्‍पनीयों के खिलाफ शिकायत किये जाने का कोई भी कारगर ऑन लाइन चैनल अभी तक उपलब्‍ध नहीं है ।   

शुक्रवार, 21 मार्च 2008

गुरुवार, 20 मार्च 2008

फिर ठप्‍प हुयी एयरटेल की इण्‍टरनेट सेवायें, 20 दिनों के दरम्‍यां 13 वीं बार एयरटेल फेल

फिर ठप्‍प हुयी एयरटेल की इण्‍टरनेट सेवायें, 20 दिनों के दरम्‍यां 13 वीं बार एयरटेल फेल

नहीं सुनी जातीं एयरटेल कस्‍टमर केयर पर उपभोक्‍ताओं की शिकायतें

भोपाल/मुरैना 20 मार्च 08, देश की आवाज बनने का दावा और उपभोक्‍ताओं को बेहतरीन सेवायें देने का दावा करने वाली देश की ऊंची दूकान भारती एयरटेल की सेवायें पिछले 20 दिनों के दरम्‍यां आज फिर 13 वीं बार फेल हो गयीं ।

लैण्‍ड लाइन और वायरलेस तथा मोबाइल के जरिये इण्‍टरनेट सेवायें मुहैया कराने के कम्‍पनी के खोले दावों की कलई इसी बात से खुलती है कि जहॉं सरकिट अनुपात 1:6 से अधिक नहीं होना चाहिये वहॉं एयर टेल का सरकिट अनुपात लगभग सौ गुना अधिक है ।

लगभग हर तीसरे दिन फेल हो जाने वाला एयरटेल का इण्‍टरनेट केवल लैण्‍ड लाइन उपभोक्‍ताओं के लिये ही समस्‍या हो ऐसा नहीं है । इस कम्‍पनी के वायरलेस और मोबाइल इण्‍टरनेट उपभोक्‍ताओं की हालत तो और अधिक खस्‍ता है ।

मोबाइल और कम्‍प्‍यूटर पर वेबसाइटों का न खुलना, कनेक्टिविटी आमतौर पर न होना पीपीपी लिंक डिस्‍कनेक्‍शन, कनेक्‍शन गति .033 से 1.2 के.बी.पी.एस. तक गिर कर कनेक्‍शन चलना एयरटेल उपभोक्‍ताओं के लिये आम बात है । आप न ई मेल भेज सकते हैं और न प्राप्‍त कर सकते हैं ।

 मजे की बात यह है कि आप कस्‍टमर केयर पर नंबर लगाते रहिये, पहले लगभग 20 मिनिट आपको ये दबाईये वो दबाईये में घुमा घुमा कर हुड़कचुल्‍लू बना दिया जायेगा उसके बाद या तो शराअ में धुत्‍त कोई महानुभाव सीधे सपाट शब्‍दों में कह देंगें कि श्रीमान आपने गलत नंबर लगाया है आप 12121 लगाईये, आप कहेंगे कि हमने 12121 ही लगाया है तो वे कहेगें कि नहीं गलत है आप फिर लगाईये, आप फिर आधे घण्‍टे संघर्ष करिये और फिर या तो नंबर की घण्‍टी बज बज कर बन्‍द हो जायेगी या फिर कोई महानुभाव उभरेंगे और कहेंगें श्रीमान आपके सेट की सेटिंग गलत हैं या फिर आपके कम्‍प्‍यूटर में भारी गड़बड़ है, गोया अन्‍तर्यामी महाराज को वहीं से पता लग जाता है कि यहॉं किलोमीटरों दूर क्‍या गड़बड़ है । पठ्ठो को बताईये कि नहीं श्रीमान हम चार महीने से जिस सेटिंग पर चला रहे हैं, वही सेटिंग है, तो फिर कहेगे ठीक है आप इस नंबर को दोबारा लगाईये आपकी बात टेक्‍नीकल सेक्‍शन से होगी, वे आपकी समस्‍या समाधान करेंगे ।

आप फिर आधे घण्‍टे जूझिये फिर कोई महानुभाव या सुन्‍दरी प्रकट होगी और बोलेगी, सर हमारा नेटवर्क इस समय डाउन चल रहा है कृपया चार घण्‍टे बाद ट्राई करें ।

आप इसी तरह इन्‍तजार करते रहिये, सारा सारा दिन सारी सारी रातें यूं ही गुजारते रहिये, आपके तीन दिन बीत जायेंगे, फिर अपने आप कनेक्‍शन काम करने लगेगा । फिर एक या दो दिन कनेक्‍शन चलने के बाद इतिहास फिर अपने आपको दोहराने लगेगा ।

एयरटेल की दुर्दशा से दो चार होने वाले उपभोक्‍ताओं ने बताया कि जब ऊपर के किसी अधिकारी का नंबर मागा जायेगा तो उपलब्‍ध ही नहीं कराया जाता, ऊपर के अधिकारीयों के नंबर एयरटेल की वेबसाइट तक पर उपलब्‍ध नहीं हैं । न किसी वरिष्‍ठ अधिकारी का ई मेल पता ही पृथक से वेबसाइट पर उपलब्‍ध है , और जो कॉमन शिकायती नंबर तथा ई मेल पते या एस.एम.एस. नंबर दिये गये हैं, उन पर कभी कोई कार्यवाही नहीं होती । या तो शराब में धुत्‍त लो कस्‍टमर केयर पर बैठे उल्‍टी सीधी बातें करके ग्राहकों को मूर्ख बनाते रहते हैं या फिर झूठे वायदों और आश्‍वासन के जरिये टाइम पास करते रहते हैं ।

सबसे अधिक नुकसान उन उपभोक्‍ताओं का होता है जिन्‍होंने दस रूपये प्रति दिन या लैण्‍डलाइन के असीमित उपयोग के प्‍लान ले रखे हैं, महीने भर में वे बमुश्किल तीस दिनों में से दो या तीन दिन का औसत उपयोग कर पाते हैं, शेष समय येन केन प्रकारेण कनेक्‍शन डिस्‍टर्ब या ठप्‍प ही रहता है । लगभग साठ-सत्‍तर उपभोक्‍ताओं द्वारा हमारे कार्यालय में की शिकायत में बताया है कि उनका मासिक प्रभार या दैनिक प्रभार तो नियमित रूप से एयरटेल द्वारा वसूला जाता है लेकिन सेवाये केवल वायदे और वसूली के विरूद्ध महज दस फीसदी ही दी जातीं हैं ।

भारत सरकार द्वारा, नामी कम्‍पनीयों की सेवाओं की नियमित व गुप्‍त जॉंच न किये जाने से देश में संचार कम्‍पनीयों द्वारा किये जा रहे उपभोक्‍ताओं के भारी शोषण और ठगी को रोके जाने की अभी तक कोई कारगर व्‍यवस्‍था नहीं हैं । इन कम्‍पनीयों के खिलाफ शिकायत किये जाने का कोई भी कारगर ऑन लाइन चैनल अभी तक उपलब्‍ध नहीं है ।      

           

सोमवार, 17 मार्च 2008

''मीडिया पूरी संजीदगी के साथ ग्रामीण पत्रकारिता को प्रोत्साहित करे''

''मीडिया पूरी संजीदगी के साथ ग्रामीण पत्रकारिता को प्रोत्साहित करे''

 

ग्रामीण पत्रकारिता विषय पर जनसंपर्क विभाग की कार्यशाला सम्पन्न

 

ग्वालियर 16 मार्च 08 भारत की आत्म गांवों में बसती है । गांव में ऐसे विविध आयाम हैं जो संचार माध्यमों में जगह पाकर समाज को नई दिशा दे सकते हैं । गांवों की उपेक्षा, मीडिया के अधूरेपन का परिचायक है । गांव न केवल अखबारों के पन्नों पर प्रमुखता से काबिज हो बल्कि दूरस्थ अंचल में काम करने वाले ग्रामीण पत्रकारों को भी साधन, सुविधा, स्वाभिमान व पूरी सुरक्षा मिले । यह  अखबार, सरकार व समाज की साझी जिम्मेदारी है ।

       यह निष्कर्ष जनसंपर्क विभाग द्वारा ग्रामीण पत्रकारिता पर आयोजित कार्यशाला में दिन भर चले चिंतन मंथन से निकल कर सामने आया । आज राज्य स्वास्थ्य प्रबंधन एवं संचार संस्थान में सम्पन्न हुई इस कार्यशाला में अखबारों के संपादकगण व वरिष्ठ संवाददाता, इलैक्ट्रोनिक मीडिया के प्रतिनिधि, ग्रामीण पत्रकारिता के विशेषज्ञ व शोधार्थी, जनसंपर्क विभाग के वरिष्ठ अधिकारीगण, संवादमित्र तथा ग्वालियर एवं चंबल सभाग के दूर दराज से आये ग्रामीण पत्रकारों ने हिस्सा लिया ।

       भोपाल से आये अपर संचालक जनसंपर्क श्री आर.एम.पी. सिंह ने गांवों से सतत संपर्क का महत्व प्रतिपादित करते हुये कहा कि राम ने जब दूरस्थ गांवों की ओर रूख किया था तब वे व्यक्ति मात्र थे । उन्होंने ग्रामीणों व वनवासियों से घुलमिलकर तत्कालीन समाज की कठिनाईयों को समझा और तब की संचार प्रणाली का उपयोग कर वे अपनी बात को जन-जन तक पहुंचाने में सफल रहे । राम जब आताताइयों का खात्मा करके अयोध्या लौटे तब वे व्यक्ति से भगवान बन गये । उन्होंने कहा गांवों में जंगल, वन्य प्राणी पुरा संपदा आदि का जो विनाश हमें दिखाई दे रहा है उसके लिये कहीं न कहीं हम भी दोषी हैं, क्योंकि इन सबके महत्व को समझाने में हमने ठीक ढंग से कोशिश नहीं की है । श्री सिंह ने कहा कि हम सभी को ग्रामीण पत्रकारों को प्रशिक्षित कर उन्हें सशक्त बनाना है । ग्रामीण पत्रकारिता को प्रोत्साहित करने के लिये विभाग ने संवाद मित्र योजना शुरू की है । उन्होंने विभागीय अधिकारियों से कहा कि इस कार्यशाला से ग्रामीण पत्रकारिता के संबंध में प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर वर्क प्लान तैयार करें, ताकि उसे शासन को भेजा जा सके ।

       वयोवृध्द पत्रकार श्री कीर्तिदेव शुक्ल ने सुझाव दिया कि संपादकगण इस बात पर ध्यान दें कि दूरस्थ अंचल से आने वाली ग्रामीण परिवेश की खबरें भले ही विलंब से छपें परंतु रूकें नहीं । उन्होंने आज की कार्यशाला को ग्रामीण पत्रकारिता के प्रोत्साहन के लिये नीव की संज्ञा दी ।

       आचारण के संपादक डॉ. रामविद्रोही ने कहा कि ग्रामीण पत्रकारिता को अखबारों में प्रमुखता से जगह देने में कोई समस्या नहीं है । इसके लिये प्रतिबध्दता की आवश्यकता है । ग्रामीण पत्रकारों को समकालीन वातावरण से भाषा, भाव, लाघव और हुनर से सुस्सजित करने की जरूरत है । उन्होंने गांवों को समझने के लिये लोकयात्रा पर जोर दिया ।

       नई दुनिया के संपादक श्री राकेश पाठक ने कहा हालांकि अखबारों के विविध संस्करण होने से आंचलिक पत्रकारों की खबरों को जगह तो मिलने लगी है, फिर भी शहरी पत्रकारिता की अपेक्षा ग्रामीण पत्रकारिता एक चुनौती और जोखिम भरा काम है । इसलिये ग्रामीण पत्रकारों को सुरक्षा के साथ विशेष प्रोत्साहन देने की जरूरत है । उन्होंने कहा कि खबर अपना स्थान खुद नियत करती है, इसलिये ग्रामीण पत्रकार अच्छी खबर लिखने के लिये अपने आपको पारंगत करें ।

       नवभारत के संपादक डॉ. सुरेश सम्राट ने कहा कि इसे हम खुले मन से स्वीकार करते हैं कि अखबार, रेडियो, दूरदर्शन, स्वयंसेवी आदि संस्थायें, इलेक्ट्रानिक मीडिया जितनी संजीदगी गांव की रोमांचकारी खबरों में दिखाते हैं उतनी संजीदगी ग्रामीणों के दुख-दर्द वाली खबरों के लिये दिखाई नहीं देती । उन्होंने ग्रामीण पत्रकारों का आह्वान किया कि वे आंचलिक पन्ने का भरपूर उपयोग कर गांवों की कठिनाईयों व समस्याओं को उजागर करें । साथ ही प्रेरणादायी आयामों को भी सामने लायें ।

       वरिष्ठ पत्रकार श्री देवश्री माली ने कार्यशाला के विषय का प्रवर्तन करते हुये इसे छटपटाते हुये विषय की संज्ञा दी । उन्होंने कहा कि यह तथ्य और पीड़ा हम सब आपस में शेयर तो करते हैं कि मीडिया से गांव दूर होता जा रहा है लेकिन गांव, गरीब और उनकी समस्याओं को उजागर करने में उतनी रूचि मीडिया नही लेता है ।

सांध्य समाचार के प्रधान संपादक डॉ. केशव पाण्डेय ने ग्रामीण पत्रकारों के लिये पुरस्कार, पाठयक्रम व प्रोत्साहन नीति तय करने पर जोर दिया । जागरण के संपादक श्री संजय बेचेन ने दूरस्थ ग्रामों को मीडिया संस्थान द्वारा गोद लेने और उसके लिये प्रतिबध्दता के साथ काम करने का सुझाव दिया । वरिष्ठ पत्रकार श्री अवध आनंद ने ग्रामीण अंचल से आने वाली चिट्ठी पत्रियों के जरिये उभरती ग्रामीण पत्रकारिता को सम्मानित बनाने, श्री महेश झा ने ग्रामीण पत्रकारिता में केमरे की भूमिका, सांध्यवार्ता के वरिष्ठ पत्रकार श्री धर्मेन्द्र भदौरिया ने ग्रामीण खबरों को ऊपर लाने व ग्रामीण सूचना तंत्र को मजबूत करने की बात कही । ग्वालियर हलचल के संपादक श्री प्रदीप माण्डरे ने ग्रामीण स्तर पर भी कार्यशाला आयोजित करने तथा श्री आलोक पंडया ने स्थानीय व आंचलिक चैनलों पर ग्रामीण क्षेत्र को उभारने का सुझाव दिया । श्री अपूर्व शिन्दे ने आंचलिक पृष्ठ की व्यवस्था ''गांव के पन्नो'' तक बढ़ाये जाने की बात कही । विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के श्री जयंत तोमर ने ग्रामीण पत्रकारों को रमन मेगसेसे पुरस्कार से सम्मानित पी सांई नाथ जैसी लगन अपनाने को कहा । वरिष्ठ पत्रकार श्री राकेश अचल ने कार्यशाला का संचालन किया और बीच-बीच में ग्रामीण पत्रकारिता से संबंधित आधारभूत जानकारी प्रदान की ।  चस्का एफ.एम. चेनल के स्टेशन हैड श्री सुरेन्द्र माथुर ने कहा कि ग्रामीण पत्रकारिता के लिये सुशिक्षित संवाददाताओं की जरूरत है । ग्वालियर टाइम्स डॉट कॉम वेबसाइट के प्रधान संपादक श्री नरेन्द्र सिंह तोमर आनन्‍द ने कहा कि ग्रामीण अंचल की समस्याओं व मानव अधिकार के मामलों पर फोकस करने की जरूरत है । शोधार्थी श्री राहुल त्रिपाठी ने पत्रकारिता में स्थानीयता बोध को बढ़ावा देने की बात कही । संवादमित्र श्री राम कुमार सिकरवार ने संवाद मित्र के कार्यों पर प्रकाश डाला ।   

कार्यशाला के द्वितीय सत्र में प्रश्न मंच कार्यक्रम हुआ इसकी अध्यक्षता सांध्यवार्ता के संपादक श्री धर्मेन्द्र भदौरिया ने की । इस सत्र में श्री अवध आनंद, श्री देवश्री माली, श्री अरूण तोमर, श्री जयंत तोमर आदि ने ग्रामीण पत्रकारिता से संबंधित प्रश्नों का उत्तर दिया । प्रश्न मंच में मुरैना से आये श्री यदुनाथ तोमर, चंबलवाणी के श्री सुमन सिकरवार, राष्ट्रीय सहारा के श्री अरविन्द चौहान ने अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया ।

कार्यशाला के प्रारंभ में संयुक्त संचालक जनसंपर्क श्री सुभाष चंद्र अरोड़ा ने कार्यशाला की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुये कहा कि गांव का अर्थ केवल किसान से नहीं समग्रता से लिया जाना चाहिये । ग्रामीण पत्रकारिता पर यह जो सिलसिला शुरू हुआ है । उसमें स्थानीय संपादकगण व एन.जी.ओ. सहित सभी के सहयोग से अच्छे परिणाम सामने आयेंगे । कार्यशाला के द्वितीय सत्र का संचालन श्री जावेद खान ने किया । कार्यशाला के अंत में आभार प्रदर्शन सहायक संचालक जनसंपर्क श्री डी.डी. शाक्यवार ने किया ।

फोटो प्रदर्शनी भी लगी

ग्रामीण जीवन को गहराई व संदेवना के साथ अंकित करने वाले छायाचित्रों की आकर्षक प्रदर्शनी भी कार्यशाला स्थल पर लगाई गई । प्रदर्शनी में यदुनाथ तोमर, संजय माडिल, अतर सिंह डण्‍डोतिया, रूपेश श्रीवास्तव सहित शासकीय एजेन्सी के छायाचित्रों का प्रदर्शन किया गया ।

 

आनन्‍द से अनंग भये ठाकुर साहब

ग्‍वालियर टरइम्‍स डॉट कॉम के प्रधान सम्‍पादक नरेन्‍द्र सिंह तोमर आनन्‍द को समाचारपत्रों में नरेन्‍द्र सिंह तोमर अनंग छापा गया है, मुरैना में लोग अब ठाकुर साहब को आनन्‍द जी के साथ अनंग जी भी कहना शुरू कर दिये हैं । दरअसल जनसम्‍पर्क कार्यालय के कम्‍प्‍यूटर में हुयी जरा सी गड़बड़ ने आनन्‍द को अनंग कर दिया ।

मुरैना में बार एसोसियेशन के कुछ वकीलों ने खबर का मजा लेते हुये नरेन्‍द्र सिंह तोमर आनन्‍द के दोबारा जवान होने पर बधाईयां देते हुये देर रात तक तोमर को जवान हो जाने का अहसास कराया ।

उल्‍लेखनीय हे कि अनंग कामदेव का दूसरा नाम है ।   

 

ग्रामीण पत्रकारिता बनाम भारतीय पत्रकारिता

ग्रामीण पत्रकारिता बनाम भारतीय पत्रकारिता

-आर.एम.पी.सिंह

अपर संचालक जनसम्‍पर्क विभाग म.प्र.शासन

गाँव का महत्व-

       ईश्वर ने गांव को बनाया, मनुष्य ने शहर बनाया । गांव में खेत हैं, खलिहान हैं, नदी है, तालाब है,बाग-बगीचा है, पक्षियों का कलरव है, रंभाती गायें हैं, वहां प्रकृति बसती है, भारत माता गांव में ही रहती है । बापू जी ने भी कहा था भारत की आस्था गाँव में रहती है । सुमित्रा नंदन पंत ने कहा - मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम।शहर बढ़ते गये गाँव लुटता चला गया। गाँवों में भी अब शहरों की नकल होने लगी । शहर गांव का शोषण करने लगा ।

       भारत की पत्रकारिता - स्वतंत्रता संग्राम की देन है । स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कहीं न कहीं पत्रकारिता से जुड़े थे । वे पत्र निकालते थे, पत्रों में लिखते थे । उनका उध्देश्य था गुलामी की बेड़ी से भारत माता को मुक्त कराना । इस कार्य में वे सफल हुए । इमें आजादी मिली । आजादी के बाद जो ह्रास राजनीति का हुआ, वहीं पत्रकारिता का भी । हम गाँव से आये लेकिन गाँव को भूलते चले गये ।

       स्वतंत्रता प्राप्ति तक पत्रकारिता मिशन थी , अब प्रोफेशन हो गई । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उद्भव के पश्चात समाचारों में एक विस्फोट आया है । मुझे प्रसन्नता होती है जब छोटी-छोटी खबरें भी इलेक्ट्रॉनिक चैनेल्स पर आती हैं । लेकिन जिस प्रकार ' विलेज जर्नलिज्म' को उभर कर आना चाहिये, नहीं आया है । राजधानी और बड़े शहरों की पत्रकारिता का स्तर बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों और सत्ता के गलियारों में बैठे नौकरशाहों के संबंधों के आधार पर मापा जाता है । गाँव की समस्याओं को सुलझाने में क्या मिलने वाला  है । शहर में शान है, शोहरत है, पैसे हैं । लेकिन गाँव में खबरें हैं। मौलिक खबर ।

       भगवान कृष्ण गाँव से जुड़े थे, तत्कालीन समस्याओं के निराकरण में क्रियाशील थे। समाज ने उन्हें भगवान बना दिया । भगवान राम शहर से गांवों में गये । उनका वनवास तत्कालीन 'रूरल जर्नलिज्म' से जुड़ा था । जब वे चलते थे, तो ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं की जानकारी लेते थे, उनसे चर्चायें करते थे ।

'' पूछत ग्राम वधु सिय सों सखि सांवर है सो रावर को है ''

और '' समाचार पुरवासिन्ह पाये ।''

उस समय शांति के क्षेत्र में कुछ राक्षसों द्वारा लूट-पाट की जाती थी । जो विरोध करता उसे मौत के घाट उतार दिया जाता था। अत: श्रीराम ने चित्रकूट से प्रस्थान के समय '' पत्रकार वार्ता'' बुलाई थी जिसमें यह घोषणा की थी कि इस धरती को मैं उत्पातियों से मुक्त कर दँगां '' और श्री राम के इस संदेश को ऋषि मुनियों और उनके आश्रम में रह रहे शिष्यों ने इतना प्रचारित प्रसारित किया कि रावण और उसकी लंका तक यह समाचार पहुंच गया कि श्रीराम मनुष्य नहीं, ईश्वर हैं । शारीरिक रूप से रावण को श्रीराम ने परास्त किया, परन्तु मानसिक रूप से उसे तत्कालीन मीडिया ने पराजित कर दिया था । ग्रामीण पत्रकारिता का प्रतिफल था कि जब श्रीराम अयोध्या से चले थे, तो एक मनुष्य थे, लेकिन 14 वर्ष के बाद जब लौटे तो भगवान बन गये थे ।

       यहां मैं दो पत्रकारों की चर्चा करना चाहूंगा। अमेरिका में '' विलेज जर्नलिज्म' के जनक हैं रूडी एवरामसन । वे रूरल रिपोर्टर के रोल मॉडल थे । उन्होंने अमेरिका में ' रूरल जर्नलिज्म संस्थान ' की स्थापना की थी । वे आजीवन इस बात के लिये संघर्ष करते रहे कि रिपोर्टिंग के माध्यम से जनता की सेवा करों । वे आजीवन अपने आप से अनजान बने रहे और ' आत्म महत्व ' को कभी महत्व नहीं दिया । उन्होंने ग्रामीण पत्रकारिता में अमेरिका में राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया थ ।

       अपने देश में भी एक पत्रकार 'द हिन्दू ' के श्री पी साईंनाथ हैं जो इस पत्र में ' रूरल एफेयर्स ' के एडिटर हैं । उन्हें  ' ग्रामीण भारत की आवाज ' की संज्ञा दी गई है । सांईनाथ वर्तमान में रूरल रिपोर्टर में अग्रणी हैं । उन्होंने रूरल इंडिया पर 84 रिपोर्ट लिखे । उनकी प्रसिध्द पुस्तक है' ''Every body loves a good Drought''  श्री साईंनाथ आज भी ग्रामीण क्षेत्र की वास्तविकता से सवयं को परिचित कराने के लिये वर्ष में 280 दिन ग्रामीण क्षेत्र में बिताते हैं । उन्हें 2007 में रमन मेगासेसे पुरस्कार से नवाजा गया है  और भी कई पुरस्कार और सम्मान उन्हें मिले हैं । उनका मनना है कि आप जिस स्थान की रिपोर्टिंग करने जाते हैं- वहां के इतिहास, भूगोल, जलवायु आदि का पूरा ज्ञान होना चाहिये ।

क्या देखें -

       ग्रामीण क्षेत्र में मुख्य रूप से कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, रीति-रिवाज, भेद-भाव, गरीबी, कुपोषण, वनों का क्षरण, खनिजों का दोहन आदि समस्यायें रहती हैं । आज के _ढ़दृ'द्म कुछ तो अच्छा कर रहे हैं, कुछ _ढ़दृ के माध्यम से पैसा कमा रहे हैं। ऐसे संगठनों पर भी आप सबकी दृष्टि रहनी चाहिये । आमजनों की समस्याओं पर ध्यान आकृष्ट करना ग्रामीण पत्रकारिता का उध्देश्य है ।

       मैं अपने विभाग के अधिकारियों से कहना चाहूंगा कि वे भी ग्रामीण क्षेत्रों में जायें। बहुत सी ऐसी बाते हैं जिसे आप लिख तो नहीं सकते , लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के ध्यान में लाई जा सकती हैं । इससे उसके निराकरण के प्रयास होंगे। जन सम्पर्क के लोग जनता से जुड़ें  तो उनके कार्य में और निखार आयेगा । छोटी से छोटी बात उच्च स्तर पर महत्वपूर्ण हो जाती है । आप अपने वरिष्ठ अधिकारियों को रिपोर्ट करते रहें। मीडिया में आने से पूर्व अधिकारियों को मालूम हो जाये ऐसा प्रयास आपके स्तर पर होना चाहिये ।

-आर.एम.पी.सिंह

15 मार्च 08

 

अमेरिकावासी और जापानवासी भी लेते हैं पन्ना के आंवला मुरब्बा का स्वाद आंवला उत्पाद संवार रहे हैं मजदूर परिवारों का जीवन

अमेरिकावासी और जापानवासी भी लेते हैं पन्ना के आंवला मुरब्बा का स्वाद आंवला उत्पाद संवार रहे हैं मजदूर परिवारों का जीवन

By - J.P. Dhoulpuria , Public Relations Oficer District Panna M.P.

 

पन्ना 17 मार्च- पन्ना के सकरिया गांव के आंवला मुरब्बे के स्वाद और मिठास की चर्चा सात समंदर पार तक पहुंच गई है। महिला कारीगरों के कुशल हाथों से निकला यह आंवला मुरब्बा पर्यटकों के जरिए सकरिया गांव से अमेरिका और जापान तक का सफर तय कर चुका है।

 

              पन्ना जिले का सकरिया गांव झांसी-इलाहाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर बसा है। यहां पहुंचते ही नजर आते हैं लद्यु वनोपज प्रसंस्करण एवं उपचार केन्द्र के 42 हैक्टेयर में फैले आंवला के पेड़, जिनसे सालाना पैदा होता है उन्नत नस्ल का 60 क्ंविटल आंवला । गरीब परिवारों का जीवन संवारने के लिए राज्य सरकार की पहल पर उत्तर वन मंडल ने इन आंवलों के विभिन्न उत्पाद तैयार करने का काम शुरू किया था। इस आंवला केन्द्र में सकरिया समेत हीरापुर एवं चौपड़ा गांव के गरीब परिवारों के 25 पुरूषों और 50 महिलाओं को काम पर लगाया गया। इनमें अधिकांश आदिवासी वर्ग के लोग शामिल हैं। आज इन लोगों ने अपनी मेहनत और आत्मविश्वास से आत्मनिर्भरता की एक ऐसी कहानी लिखी है, जिसने सकरिया को एक नई शक्ल और एक अलग पहचान दी है।

 

              इन तीनों गांवों की गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले करीब चार दर्जन परिवारों की महिलाएं आंवला उत्पादों को स्वादिष्ट रूप देने में माहिर हो गई हैं। आंवलों पर इनकी श्रम साधना की ख्याति आज देश की सीमाएं लांघकर विदेशों में धाक जमाने की राह पर हैं। सकरिया गांव इन महिलाओं की बदौलत आंवला उत्पादों के उत्पादन का बड़ा केन्द्र बनने लगा है। आंवला केन्द्र के मिठास और स्वाद से भरे आवंला उत्पाद पर्यटकों को लुभाने में सफल हो रहे हैं और विदेशी पर्यटक अपने साथ आंवला मुरब्बा ले जाना नहीं भूलते हैं।

 

              लद्यु वनोपज प्रसंस्करण एवं उपचार केन्द्र में जो उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, उनमें आंवलों का मुरब्बा, अचार, लड्डू, बरफी, सुपारी एवं आंवला रस प्रमुख हैं। यहां तक कि त्रिफला भी तैयार किया जा रहा है। उत्पाद निर्माण की इस पूरी प्रक्रिया में ज्यादातर हाथों के काम शामिल हैं और इसमें महिलाएं प्राकृतिक रूप से गोदने, सुखाने, बनाने व संरक्षण इत्यादि में परंपरागत तरीके अपनाती हैं। इन सभी उत्पादों की पूरी जांच की जाती है। उनकी गुणवत्ता मानकों का पूरा ध्यान रखा जाता है और कीमत भी वाजिब रखी जाती है। यही वजह है कि इन उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं की रूचि बढ़ी है। केन्द्र निर्मित उत्पादों का दिल्ली, मुम्बई, इन्दौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन आदि देश के अधिकांश भागों में अच्छी खासी मांग है। निर्माण कार्य से जुडे हर श्रमिक को न केवल श्रम के लिए मेहनताना मिलता है, बल्कि लांभाश भी दिया जता है।

              आज यह केन्द्र ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजित कर आजीविका कमाने का आदर्श बन गया है। केन्द्र के अस्तित्व में आने के बाद सकरिया, हीरापुर, चौपड़ा ग्राम के 75 लोगों की साल भर की कमाई का इंतजाम तो है ही, इसके साथ-साथ वहां की महिलाओं के हाथों में आजीविका के लिए कल तक पेड़ों को काटने के लिए कुल्हाड़ी रहती थी, उन्हें एक नई भूमिका मिली है, जिसने उनके आत्मविश्वास को भी बढ़ाया है। कभी फांकाकशी करने वाले इन गरीब परिवारों के घरों के हालात बदल गए हैं। अच्छी आमदनी होने से कई मजदूर परिवारों ने मकान बना लिए हैं और जमीन खरीद ली है। उनके रहन-सहन का स्तर बदल गया है। उत्तर वन मंडल के वनमंडलाधिकारी श्री निजाम कुरैशी बताते हैं कि आंवला उत्पाद निर्माण कार्य गांव में गरीब परिवारों के लिए रोजगार के अवसर के रूप में बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है। लद्यु वनोपज प्रसंस्करण एवं उपचार केन्द्र के प्रभारी श्री रमेश कुमार मिश्रा डिप्टी रेंजर का कहना है कि इस केन्द्र के शुरू होने के बाद से लोगों को रोजगार मिलने से इन क्षेत्रों में वनों की कटाई में भारी कमी आई है। केन्द्र के बगैर रेशे वाले उन्नत प्रजाति के आंवलों से प्रेरित होकर 24 किसानों ने मुनाफा कमाने की चाह में 30 हैक्टेयर रकवे में आंवला समेत हरर व बहेड़ा के पेड़ लगा लिए हैं।

 

गुरुवार, 13 मार्च 2008

कैसे बनते हैं नकली दांत

कैसे बनते हैं नकली दांत

सुभाषचंद्र अरोड़ा

संयुक्‍त संचालक , संभागीय जनसम्‍पर्क कार्यालय ग्‍वालियर

       कुछ बरस पूर्व मैं अपने एक दंत चिकित्सक मित्र के पास बैठा था तभी वहां एक वृध्दा नकली दांतों का सैट लगवाने आयी । व्यय आदि पूछने के बाद उसने एक विचित्र सा सवाल किया जिसे सुनकर मुझे हतप्रभ रह जाना पड़ा । वृध्दा ने पूछा, उन्हें जिन मृत व्यक्तियों के दांत लगाये जावेगें उनका भूत तो उसे परेशान नहीं करेगा ? वृध्दा की जानकारी कुछ ऐसी थी कि शमशान घाट से मुर्दों के दांत चुनकर उपयोग में लाये जाते हैं । ऐसे में अगर उन दांतों को मंत्रशक्ति से शुध्द न किया गया हो तो उन मृत व्यक्तियों का प्रेत दांतों को धारण करने वाले व्यक्ति को परेशान करेगा ।

       बहुत कम लोगों के दांत उम्र भर साथ देते हैं । उम्र के साथ गिरने वाले या कम उम्र में दांत खोने की कई वजह हो सकती है । दंत क्षय, दुर्घटना, घातक प्रहार व जन्म जात व्याधियों के कारण भी दांत समय से पहिले जा सकते हैं। ऐसे में खाने-चबाने में कठिनाई, शब्दों के स्पष्ट उच्चारण में परेशानी तथा चेहरे की बनावट प्रभावित होती है । इन दुष्प्रभावों को कम करने में नकली दांत काफी मददगार साबित होते हैं ।

       कृत्रिम दंत निर्माण के प्रारंभिक काल में संभवत: मृतकों के दांतों का भी उपयोग किया जाता रहा होगा । फिर लकड़ी के भी दांत बनाये गये व उनको रेशम की डोरी से बांधकर उपयोग किए जाने के प्रमाण मिले हैं । भारतीय कृत्रिम दंत शिल्प भी कम पुराना नहीं है । महाभारत में कर्ण के स्वर्ण निर्मित दांतों का उल्लेख भारतीय दंत शिल्प में धातु के उपयोग का एक अच्छा उदाहरण है ।

आज से लगभग आधी सदी  पूर्व तक वॅलकेनाइट  नामक रबर व पोरसेलिन निर्मित दांतों से नकली दांत तैयार किए जाते थे । पोरसेलिन के दांतों को आज भी पत्थर के दांत कहा जाता है । दांत (डेन्चर) बनाने में प्रयुक्त वेलकेनाइजिंग प्रक्रिया जटिल थी साथ ही रबर का डेन्चर बेस मुखगुहा के ऊतकों द्वारा सहज स्वीकर्य नहीं था । रबड़ का रंग भी मसूड़ों के रंग से मेल नही खाता था । दंत चिकित्सक निरंतर इस कार्य के लिए उपयुक्त विकल्प की खोज में थे । जो उन्हें एक्रेलिक प्लास्टिक के रूप में मिल गया । एक्रेलिक कृत्रिम दंत निर्माण में एक प्रकार से वरदान साबित हुआ । वर्तमान में तो प्राय: लोग वॅलकेनाइट को भूल ही चुके हैं अलबत्ता पत्थर के दांत के नाम पर पोरसेलिन का थोड़ा बहुत उपयोग आज भी हो रहा है ।

       एक्रेलिक प्लास्टिक के कुचालक होने के कारण आज भी दंत विशेषज्ञ इसे आदर्श नहीं मानते व उनकी बेहतरी के लिए तलाश भी जारी है । डेन्चर बेस में धातु का उपयोग भी हो रहा है जिसके लिए ढलाई की विशेष प्रक्रिया अपनानी पड़ती है । वर्तमान में इस कार्य के लिए चांदी सरीखी सफेद धातु वाइटेलियम का अधिक उपयोग हो रहा है । स्वर्ण धातु का भी प्रयोग किया जाता है । मुंह में होने वाली विभिन्न रसायनिक क्रियाओं का इन धातुओं पर प्रभाव भी नहीं होता ।

       नकली दांतों के पूरे सैट में 28 दांत लगाये जाते हैं । एक दो या अधिक दांतों के टूट जाने अथवा गिर जाने पर भी आवश्यकतानुसार दांत लगवाये जा सकते हैं । ऐसे में सामानयत: दो प्रकार के दांत लगाये जाते हैं । एक वह  जिन्हें मरीज स्वयं निकाल व लगा सकता है तथा दूसरे चिकित्सक द्वारा फिट कर दिए जाने पर रोगी न तो निकाल पाता  न ही निकालने की कोई आवश्यकता ही होती है। पहली प्रकार के दांत मुंह में उपस्थित अन्य दांतों व ऊतकों के सहारे टिकते हैं जबकि दूसरी किस्म के नकली दांत बगल के दांत पर खोल से जकड़े व टिके रहते हैं । इन्हें फिक्सड अथवा ब्रिज भी कहा जाता है व पुल से यह तुलनात्मक समानता भी रखते हैं । इनके निर्माण में अतिरिक्त सावधानी तथा जटिल प्रक्रिया अपनानी पड़ती है । मजबूती के लिए वाइटेलियम व गोल्ड एलाय का उपयोग किया जाता है। सुंदरता की दृष्टि से दिखाई देने वाले अग्र भाग को प्लास्टिक अथवा पोरसेलिन में वास्तविक दांतों के रंग एंव आकार के अनुरूप बनाया जाता है ।

       टूटने पर प्लास्टिक के दांत स्पष्ट रेखा में टूटते हैं जिससे इनकी मरम्मत सरल है । मरम्मत भी एक्रेलिक प्लास्टिक से हो जाती है  जिससे रासायनिक संयोजन हो जाता है व मजबूती बनी रहती है । नकली दांत (डेन्चर) का ढीला ढाला होना, ऊतकों को निरंतर काटना व इरीटेट करना गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकता है । ढीले डेन्चर के ऊतकों के सम्पर्क में आने वाले हिस्से में खाना जमा होकर सड़नें लगता है जिससे डेन्चर पहिनने वाले के मुंह से बदबू आ सकती है । ऊतकों मे डेन्चर के निरंतर चुभने व काटने से मुखगुहा के कैंसर जैसे गंभीर रोग होने की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता ।

       नकली दांतों का उपयोग करने वालों को इनकी सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए । नकली दांतों की सफाई के लिए बाजार में बहुत से डेन्चर क्लीनर्स उपलब्ध है । हल्के नमक के तेजाब के उपयोग से भी इन्हें साफ किया जा सकता है । तेजाब को घर पर रखने में बच्चों से विशेष सावधानी बरतना जरूरी हो जाता है ।

       मुंह के कैंसर जैसी बीमारियों में दांत व आसपास के रोग प्रभावित ऊतकों को आप्रेशन करके निकाल देने के अलावा जब कोई चारा नहीं रहता तो ऐसे में कभी कभी तालू का एक पूरा भाग व दांत आदि निकाल दिए जाने पर मरीज की सामान्य क्रियाओं को बनाए रखने के लिए विशेष प्रकार की प्रोसथिसिस तैयार की जाती है जिसे आप्टयूरेट कहते हैं। खाली बल्ब वाले आपटयूरेटर इस दिशा में मरीजों के तालू निकल जाने के बाद खाने, पीने व बोली समस्याओं के साथ साथ कुछ हद तक चेहरे की बनावट सुधार में भी मददगार साबित होते हैं ।

 

सुभाषचंद्र अरोड़ा

          मो.नं. 94256-19790

 

बुधवार, 12 मार्च 2008

मोती महल का पुराना वैभव पुन: सजीव

मोती महल का पुराना वैभव पुन: सजीव

असलम खान ( ब्‍यूरो चीफ जिला ग्‍वालियर )

मोती महल, बेजा ताल, इटेलियन गार्डन, चंदेरी का राज महल और न्याय भवन तथा शिवपुरी की छत्रियों का पुराना वैभव पुन: सजीव हो रहा है । यह कार्य इंटेक की देख-रेख में राजस्थान, आगरा तथा हैदराबाद के दक्ष कारीगरों द्वारा किया जा रहा है । संरक्षण कार्य की गुणवत्ता पर पूरा ध्यान दिया गया है, इसलिये काम को पूरा करने में समय भी लगा ।

       भारत का इतिहास राजनीतिक क्रांतियों और युध्द बाहुल्य से भरा हुआ है । कितने राज्य और राजे और विनिष्ट हो गये । चौदवीं सदी से मुस्लिम आक्रमण के उपरांत राजस्थान आये और बुंदेलखंड में राजप्रसाद निर्माण में पत्थर का उपयोग होने लगा । यह भी हो सकता है कि युध्द में बारूद के उपयोग के कारण बचाव की दृष्टि से अधिक मजबूत और सुरक्षित निर्माण के लिये भी पत्थर का प्रयोग किया जाने लगा । शायद तभी भारतीय राजप्रसाद (मान मंदिर) दुर्ग के भीतर सुरक्षित स्थल पर निर्मित किये जाते थे । ग्वालियर का प्राचीन राजमहल, गूजरी महल, प्राचीन दुर्ग की दीवार के सिरे के अधिकांश भाग पर स्थित है जिसके निर्माण का श्रेय मानसिंह (1486-1518 ई.) को है । कालान्तर में ग्वालियर के सिंधिया शासको ने शुक्राचार्य के बताये सिध्दांतानुसार सरोवर युक्त (बेजाताल) विशाल राज प्रसाद मोतीमहल बनवाया । जिसमें सभा मंडप, कार्यालय और राजवंशकों के निवास का प्रावधान किया गया था । शिल्पकारों ने शीतलता, विश्राम और सौंदर्य पूर्ति के लिये कला की ठोस और सुंदर रूचि का परिचय दिया । प्रभावोत्पादक दोहरे कारनीस, जलमार्ग, फौवारा और तलघर सब खास है मोती महल में ।

       मोती महल में 42 रागमाला चित्र विशेष महत्वपूर्ण है कारण रागमाला परंपरा के यह लगभग अंतिम चित्र हैं । सिंधिया राजाओं के आश्रय में पनपी यह चित्रकला ''राजस्थानी'' ''पश्चिम भारतीय शैली'' के साथ कहीं-कहीं कुछ स्वतंत्र अस्तित्व का परिचय देती है । सिंधिया शासन के प्रमुख जिवाजी राव सिंधिया ने मोती महल तथा अन्य महलों में ''नागपुर वाला'' नामक चित्रकार के निर्देशन में भित्ति चित्रों का निर्माण कराया था । चित्र हिन्दु पुराणों, राग-रागनियों, विशेष अवसर पर आयोजित दरबार और दशहरा जलूस के हैं । मोती महल के कुछ कमरों में कांच के जड़ाव का काम है तथा कुछ में छतों और दीवारों पर सधी हुई तूलिकाओं से खूबसूरत बेल-बूटे उकेरे गये हैं । दरबार हॉल और उसके अग्रकक्ष में स्वर्ण-वर्क से सजावट की गई है ।

       मोती महल का पूरी तरह राजप्रसाद के रूप में उपयोग नहीं हो सका । मुगलों के बाद अंग्रेजों के आ जाने से ग्वालियर राज्य के शासक योरूपीय कला से विशेष प्रभावित हुये । फलस्वरूप यहां इटालियन शैली में उनका निवास प्रसाद जय विलास महल का निर्माण हुआ और इटालियन गार्डन बनाया गया ।

       मोती महल में मध्य भारत का सचिवालय व बाद में वर्ष 1956 में मध्यप्रदेश राज्य के गठन के उपरांत संभागायुक्त कार्यालय सहित विभिन्न विभागों के शासकीय कार्यालय स्थापित कर दिये गये । समय अपनी गति से चलता रहा और कई कक्षों में सुंदर चित्रकारी को चूने ने और कई कक्षों में धुएं ने ढांप लिया । पत्थर की महराबें, जालियां क्षतिग्रस्त हो गई । इंटेक अब मोती महल के चुनिंदा हिस्से का सिलसिलेवार पुन:उध्दार कर रहा है । बेजाताल में भी ग्राउटिंग का कार्य किया जा रहा है और जल के भीतर रंगमंच को भी फिर से संवारा जा रहा है । 

       सिंधिया शासकों ने अपने पूर्वजों के शवदाह स्थल पर स्मारक के रूप में राजपूत राजाओं के समान छत्रियों का निर्माण करवाया जिनमें भारतीयता लिये मुस्लिम एवं पाश्चात्य कला की झलक दिखाई देती है । शिवपुरी, ग्वालियर रियासत की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी । यहां स्वर्गीय माधवराव सिंधिया और उनकी माता सख्याराजे सिंधिया की छत्री है जो उद्यान में स्थित है । शिवपुरी की संगमरमर से बनाई गई यह छत्रियां अद्वितीय हैं । समय के साथ उनके पत्थर की वेदरिंग हुई है और उनकी भी नकासी प्रभावित हुई है । जिसका संरक्षण बहुत आवश्यक हो गया है ।

       चंदेरी मालवा और बुदंलेखंड को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण नगर है जो चंदेरी साड़ियों के कारण विशेष ख्याति हासिल कर चुका है । साथ ही यह मध्य भारत के व्यापार मार्ग का भी पड़ाव है । यहां 9वीं एवं 10वीं सदी के जैन मंदिर धार्मिक आस्था का विशेष आकर्षण है । चंदेरी का राजमहल और न्याय भवन पुरातत्व की दृष्टि से अपना विशेष स्थान रखते हैं । इंटेक ने इसके संरक्षण का दायित्व भी अपने हाथ में लिया है ।

 

शुक्रवार, 7 मार्च 2008

भैंस चक्कर क्यों काटती है ? गेहूं के मामा का क्या इलाज करें ? चम्‍बल के किसानों की समस्‍याओं के समाधान दूरदर्शन पर पहली बार हुआ सीधा प्रसारण

भैंस चक्कर क्यों काटती है ? गेहूं के मामा का क्या इलाज करें ? चम्‍बल के किसानों की समस्‍याओं के समाधान दूरदर्शन पर पहली बार हुआ सीधा प्रसारण

खुश हुये चम्‍बलवासी दूरदर्शन पर खुद का सीधा प्रसारण देख कर

 

कृषकों ने फसल संगोष्ठी में पाया अपनी समस्याओं का समाधान

 

ग्वालियर 6 मार्च 08 । भैंस चक्कर क्यों काटती है ? गेहूं के मामा का क्या इलाज करें ? लहसुन की पत्तियां क्यूं सिकुड़ने लगती हैं ? कम वर्षा में क्या पैदा करें ? वॉटर शेड ?  मत्स्य पालन तथा मधुमक्खी पालन ?  फसलों को कीट व्याधि से कैसे बचायें ? माहू अगर मुहँ और नाक से मनुष्य के शरीर में चला जाये तो क्या असर करता है ? ... आदि-आदि कृषि, पशुपालन, बागवानी एवं कृषि आधारित उद्योग धंधों से जुड़े प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं का कल आचंलिक कृषि अनुसंधान केन्द्र मुरैना में आयोजित फसल संगोष्ठी में दस विशेषज्ञों ने समाधान किया । इस सफल संगोष्ठी का आयोजन दूरदर्शन ग्वालियर द्वारा किया गया जिसका सीधा प्रदेश व्यापी प्रसारण भी हुआ ।

       भैंस चक्कर क्यों काटती है और चक्कर काटते-काटते मर जाती है । प्रश्न था एक जागरूक पशुपालक कृषक का जिसके उत्तर में कृषि विज्ञान केन्द्र मुरैना के पशुपालन विशेषज्ञ डॉ. पी.पी. सिंह ने बताया कि सर्रा (surra) रोग के कारण ऐसा होता है । जो ट्राईपैनसो -इवेनसाई नामक पराजीवी के कारण होता है । समय पर उपचार से मवेशी की रक्षा की जा सकती है । उन्होंने रोग प्रभावित भैंस को ट्राईक्विन एस-2 एमजी इंजेक्शन खाल के नीचे लगाने की किसानों को सलाह दी ।

कीट वैज्ञानिक डॉ. एम.एल. शर्मा ने एक जिज्ञासु के प्रश्न का उत्तर देते हुये कहा कि जब मौत करीब आती है तो पंख लग जाते हैं । माहू कीट के साथ भी ऐसा ही है । दरअसल जब तक माहू फसल से चिपका रहता है तब तक ही फसल की क्षति करता है । माहू की समस्या अब सात दिन की है । माहू के नाक व मुहं में जाने से मनुष्य को किसी भी प्रकार के नुकसान की अब तक कोई जानकारी नही है। परंतु माहू कीट के आंखों में जाने से जरूर थोडी परेशानी होती है ।

       खरपतवार नियंत्रण विशेषज्ञ डॉ. धर्वेन्द्र सिंह ने बताया कि गेहूं की फसल में तंग करने वाली खरपतवार गेहूं का मामा उर्फ गुल्ली डण्डा उर्फ लल्लू घास का बॉटनीकल नेम ''फैलेरिस माइनर'' है । कृषक सल्फा सलफयूरान-25 ग्राम (सक्रिय तत्व) प्रति हेक्टर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रथम सिंचाई के उपरांत जब फसल 30 से 35 दिन के बीच हो छिड़काव करें तो गेहूं के मामा के छुटकारा पा सकते हैं । कृषक सकरी पत्तीवाले खरपतवारों से फसल की सुरक्षा के लिये आइसोप्रोटरान-75 प्रतिशत एक किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से 600 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रथम सिंचाई के उपरांत फसल के 30 से 35 दिन के बीच छिड़काव करें । चौड़ी पत्तीवाली खरपतवार बथुआ, कृष्णनील, चट्टी, जंगली पालक आदि से फसल को बचाने के लिये 2-4 डी सोडियम साल्ट 80 प्रतिशत 800 से 1250 ग्राम प्रति हेक्टर की दर से 600 लीटर पानी में मिलाकर फसल को 30 से 35 दिन के अंदर पहली सिंचाई के उपरांत छिड़काव करने की भी उन्होंने कृषकों को सलाह दी ।

       एक कृषक की कम पानी (अधिकतम तीन पानी) पर गेहूं पैदा करने की प्रबल इच्छा का समाधान करते हुये कृषि विशेषज्ञ डॉ. एस.एस. तोमर ने किसान को 20 से 25 दिन के दौरान पहला पानी, 60 से 65 दिन पर दूसरा तथा दूधिया अवस्था आ जाने पर तीसरा पानी लगाने की सलाह दी । उन्होंने कम वर्षा वाले क्षेत्र के किसानों को खरीफ में बाजरा तथा रबी में सरसों तथा चना लगाने की भी सलाह दी।

       आंचलिक कृषि अनुसंधान केन्द्र के निदेशक डॉ. वाई.एम. कूल ने कृषि जल प्रबंधन पर कृषकों की समस्याओं का समाधान किया । वॉटर शेड की अवधारणा पर प्रकाश डालने के साथ-साथ उन्होंने जल संरक्षण पर जोर दिया । उन्होंने कहा कि चंबल संभाग में 365 दिन में औसतन 25 से 28 दिन ही वर्षा होती है जो 650 एम.एम. है । उन्होंने 25 हेक्टर जल ग्रहण क्षेत्र में एक हेक्टर का दो से तीन मीटर गहरा तालाब बनाने की सलाह दी । साथ ही अतिरिक्त जल की निकासी के लिये तालाब में स्पिलवे भी रखने की सलाह दी । उन्होंने अनुसंधान केन्द्र की विभिन्न गतिविधियों से भी कृषकों को लाभ उठाने की अपील की ।

       मधुमक्खी पालन संबंधी प्रश्नों का उत्तर देते हुये वैज्ञानिक डॉ. अरविन्दर कौर ने बताया कि एक मधुमक्खी परिवार से औसतन 60 किलो शहद प्राप्त होता है । इसके अलावा मोम भी मिलता है । उन्होंने किसानों से प्रशिक्षण प्राप्त करने के उपरांत ही मधुमक्खी पालन की किसानों को सलाह दी । उन्होंने बताया कि कृषक मुरैना में आंचलिक अनुसंधान केन्द्र में भी यह प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं । साथ ही सरसों के फूलों से मुधमक्खी को मधु और परागकण दोनों ही मिलते हैं इस दृष्टि से भी मुरैना और आसपास का सरसों वाला क्षेत्र मधुमक्खी पालन की दृष्टि से श्रेष्ठ क्षेत्र है ।

       कृषकों को चने में उंगटा रोग से बचाव के लिये बीजोपचार का महत्व समझाया गया तथा फफूंद नाशक बीजोपचार की दवाओं की भी जानकारी दी गई । संगोष्ठी में कृषि उपकरणों, मत्स्य पालन, आंवले में तना मक्खी का समय रहते बचाव, सावधानियां एवं उपचार, राज्य शासन की कृषक हितकारी योजनाओं सहित विविध जानकारियां दी गई ।

       संगोष्ठी में कृषकों के साथ कृषि महाविद्यालय ग्वालियर के छात्र-छात्राओं ने भी शिरकत की । एक महिला कृषक द्वारा महिलाओं की भूमिका तथा शासकीय सुविधाओं संबंधी प्रश्न का समाधान करते हुये ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को आगे लाने वाली शासकीय योजनाओं की जानकारी दी गई ।

       शाम सवा चार बजे से प्रारंभ यह संगोष्ठी सांय साढ़े छ: बजे तक चली । केन्द्र निदेशक आकाशवाणी डॉ. आर.बी. भण्डारकर ने प्रारंभ में फसल संगोष्ठी  की पृष्ठ भूमि पर प्रकाश डाला । साथ ही कृषि वैज्ञानिकों तथा  कृषकों का स्वागत भी किया । संगोष्ठी में सर्वश्री एन.आर. भास्कर, उपसंचालक कृषि मुरैना, गोविन्द प्रसाद परते, सहायक संचालक उद्यानिकी, डॉ. वाई.एम. कूल, डॉ. एस.एस. तोमर, डॉ. एम.एल. शर्मा, डॉ. एस.के. त्रिवेदी, इंजी. के. किशोर, डॉ. धमेन्द्र सिंह, डॉ सुश्री अरविन्दर कौर तथा डॉ. पी.पी. सिंह ने बतौर विषय विशेषज्ञ शिरकत की । संगोष्ठी का सफल संचालन कृषि महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक श्री यशवंत इन्द्रापुरकर ने किया । श्री ऋषिमोहन श्रीवास्तव ने एंकर फील्ड तथा श्री आर.के. यादव एवं श्री आर.ए. झलानी ने कुशल प्रस्तुतकर्ता के दायित्व का निर्वहन किया ।