शुक्रवार, 26 मार्च 2010

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राह पर उत्तर प्रदेश?

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राह पर उत्तर प्रदेश?

निर्मल रानी

163011, महावीर नगर,  अम्बाला शहर,हरियाणा।  फोन-0171- 2535628 email: nnirmalrani@gmail.com

                  देश का सबसे बड़ा राय उत्तर प्रदेश हालांकि कांफी पहले से ही सांप्रदायिक एवं जाति आधारित राजनीति का एक गढ़ रहा है। पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने का केंद्र अर्थात् अयोध्या का विवादित राम जन्म भूमि- बाबरी मस्जिद स्थल भी इत्तेंफाक़ से इसी राय में स्थित है। लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा निकाली गई विवादित रथ यात्रा के परिणाम स्वरूप सबसे अधिक सांप्रदायिक मंथन भी इसी राय में देखने को मिला था। इसके पश्चात ही प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की वह सरकार बनी थी जिसने भारतीय संविधान की मर्यादाओं,शपथ, सभी ंकायदे-ंकानून और नैतिकता की धाियां उड़ाते हुए 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में अपनी वह भूमिका अदा की जोकि आज तक किसी राष्ट्रभक्त तथा भारतीय संविधान एवं न्यायपालिका के प्रति आस्था रखने वाले किसी राजनेता ने नहीं निभाई।

              बहरहाल उस समय से लेकर अब तक यह प्रदेश तमाम उतार-चढ़ाव व कभी- कभी तनावपूर्ण हालात से भी रूबरू होेता चला आ रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश के लगभग शांत पड़े वातावरण में वरुण गांधी द्वारा सांप्रदायिकता का एक पत्थर फेंकने की उस समय कोशिश की गई थी जबकि वह अपना पहला संसदीय चुनाव अपनी माता मेनका गांधी द्वारा उनके लिए ख़ाली की गई पीलीभीत संसदीय  सीट से लड़ने की तैयारी कर रहे थे। जैसी असंसदीय, अशोभनीय व घटिया ंकिस्म की टिप्पणीयां वरुण गांधी द्वारा एक समुदाय विशेष को निशाना बनाकर सार्वजनिक सभा में की गई थीं उसका दुष्प्रभाव भले ही उस समय प्रदेश में कहीं पड़ता न दिखाई दिया हो परंतु उनके भाषण से कम से कम इतना तो तत्काल रूप से ारूर हुआ कि वरुण गांधी चुनाव जीतकर स्वयं को पहली बार में ही विजेता सांसद की श्रेणी में पहुंचाने में सफल हो गये। परंतु वरुण के भाषण का एक दूसरा दुष्प्रभाव यह भी पड़ा कि पीलीभीत के आस पास के शहरों तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक आधार पर कानांफूसी तथा वातावरण में सांप्रदायिकता का ाहर घुलने की भनक अवश्य सुनाई देने लगी।

              गत् दिनों उत्तर प्रदेश के सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक समझे जाने वाले बरेली जैसे शहर में हुआ सांप्रदायिक दंगा इसी सिलसिले की एक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि बरेली शहर का कांफी बड़ा इलाक़ा लगभग 20 दिनों तक कर्फ्यू ,लूटपाट तथा आगानी की चपेट में रहा। फिर भी शुक्र इस बात का है कि इन दंगों के दौरान किसी भी समुदाय के किसी व्यक्ति के मारे जाने का कोई समाचार नहीं मिला है। बरेली दंगे के तरीकों व उसके कारणों आदि को लेकर बरेली वासी न केवल आश्चर्य में हैं बल्कि वहां का वह निष्पक्ष हिंदु व मुसलमान जो आज भी बरेली को हिंदु- मुस्लिम सांझी तहाीब का शहर मानता  है इस बात की तह में जाने क ा इच्छुक है कि आख़िर यह कथित दंगा किन परिस्थितियों में हुआ,दंगे में शरीक होने वाले दंगाई किस माहब के थे? यह कहां से आए थे तथा इनका केंद्रीय लक्ष्य आंखिर क्या था?

              दंगा प्रभावित वे लोग जिनकी दुकानों में आग लगाई गई तथा करोड़ों की संपत्तियां स्वाहा कर दी गईं उनमें हिंदु दुकानदार भी शामिल थे और मुसलमान दुकानदार भी। चश्मदीद दुकानदारों (हिंदु व मुसलमान) दोनों का कहना था कि उन्हीं दंगाईयों की भीड़ जब हिंदुओं की दुकानों में आग लगाती तो अल्लाह हो अकबर का नारा बुलंद करती और दंगाईयों की वही भीड़ जब किसी मुस्लिम दुकानदार की दुकान को अगि् की भेंट चढ़ाती तो जय श्री राम का उद्धोष करने लग जाती। दंगाईयों की इन हरकतों ने बरेली वासियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि दंगाईयों के यह अंजाने व अपरिचित चेहरे आंखिर कहां से संबंध रखते हैं और इनकी हरकतें हमें क्या संदेश दे रही हैं। दंगे शुरु होते ही सांप्रदायिक दलों के नेताओं ने अपनी राजनैतिक रोटियां सेकनी शुरु कर दीं। वरुण गांधी की मां तथा बरेली व पीलीभीत के मध्य पड़ने वाले संसदीय क्षेत्र आंवला से भाजपा सांसद मेनका गांधी    बरेली शहर में चल रहे कर्फ्यू के दौरान वहां जाने का प्रयास करने लगीं। उधर पूर्वांचल में सांप्रदायिक राजनीति को धार देने वाले एक और भाजपा सांसद योगी आदित्य नाथ भी बरेली आने के लिए उतावले हो उठे। इन दोनों ही नेताओं को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा बरेली पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया। मेनका गांधी जिन्हें संसद में कम ही बोलते हुए देखा जाता है,को एक अच्छा मौंका हाथ लग गया। वह संसद में बरेली मुद्दे को उठाने लगीं। उनका यह ंकदम भी पूर्णतया राजनीति से प्रेरित था। मेनका ने अतीत में वरुण गांधी द्वारा बरेली में सार्वजनिक रूप से एक समुदाय विशेष को निशाना बनाकर की गई बदंजुबानी की भी निंदा या आलोचना नहीं की थी। बजाए इसके उसे जेल में डाले जाने पर मायावती सरकार को ही कोसा था। प्रश् यह है कि वरुण गांधी द्वारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ंफिंजा बिगाड़ने के प्रयासों के बाद मेनका गांधी बरेली आख़िर क्या करने जा रही थी? जलती आग में घी डालने या उसे शांत करने? उनके सुपुत्र के भावी राजनैतिक अंदांज स्वयं इस बात के गवाह हैं कि मेनका गांधी से उसे क्या शिक्षा मिल रही है तथा राजनीति के कौन से गुण वह अपनी इस मां से सीख रहा है। बड़े आश्चर्य की बात है कि अपने पारिवारिक वातावरण को सामान्य न रख पाने वाली मेनका गांधी आज न जाने किस आधार पर हिंदुओं की मसीहा बनने की तैयारी कर रही है। यहां यह भी ंगौर तलब है कि नेहरु-गांधी परिवार के इस सदस्य को भाजपा किस सामग्री के रूप में प्रयोग करना चाह रही है।

              बेशक सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाले दल तथा नेता तो इस ताक में रहते ही हैं कि किसी प्रकार उन्हें सांप्रदायिकता की आग पर राजनैतिक रोटियां सेकने का मौंका मिले। परंतु बरेली दंगों को लेकर कई प्रशासनिक निर्णय तथा शासकीय कारगुंजारियां भी संदेह के घेरे में हैं। सबसे अहम सवाल जो बरेली प्रशासन के गले की हड्डी बना हुआ है वह यह कि बरेली में हंजरत मोहम्मद के जन्म दिवस अर्थात् बारह वंफात के दिन निकलने वाले जुलूस की अनुमति अलग-अलग तिथियों पर दो बार क्यों दी गई? जबकि हंजरत मोहम्मद का जन्म दिन एक ही दिन यानि रबीउलअव्वल माह की 12 तारीख़ को पूरे देश में सुन्नी मुसलमानों द्वारा मनाया जाता है। और दूसरा सवाल प्रशासन से यह किया जा रहा है कि यह जुलूस-ए- मोहम्मदी अपने पारंपरिक रास्ते से भटक कर दूसरे विवादित मार्ग पर क्यों और कैसे चला गया? जिसके बाद दंगे भड़क उठे। यहां दो ही बातें हो सकती हैं या तो प्रशासन की रंजामंदी से यह नया रास्ता आयोजकों द्वारा चुना गया और यदि जुलूस की भीड़ ंजबरदस्ती इस मार्ग पर चली गई तो भी पुलिस बल इसे रोक पाने में क्यों असफल रहा? दोनों ही परिस्थितियां शासन व प्रशासन के लिए सवालिया निशान खड़ा करती हैं।

              बहरहाल लगभग बीस दिनों तक दंगे की आग और धुएं में लिपटे बरेली शहर की ंफिंजा में एक बार फिर अमन व शांति के संदेश गूंजने लगे हैं। पारंपरिक भाईचारा भी इस शहर में वापस आने लगा है। परंतु बरेली से दूर बैठे उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक राजनीति का मंथन करने वाले विशेषज्ञों को इस शहर के प्राचीन लक्ष्मीनारायण मंदिर की उस बुनियादी हंकींकत को नंजर अदांज नहीं करना चाहिए जो हमें यह बताती है कि प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेंद्र प्रसाद द्वारा उद्धाटित किए गए इस मंदिर के निर्माण में सात दशक पूर्व बरेली के एक मुस्लिम रईस चुन्ने मियां ने उस समय न केवल सबसे बड़ी धनराशि अर्थात् एक लाख रुपये चंदा देकर इस मंदिर का निर्माण शुरु कराया था बल्कि इसके निर्माण से लेकर उद्धाटन तक तथा उसके पश्चात अपने पूरे जीवन भर इसके संचालन में भी उन्होंने अपनी अहम भूमिका अदा की थी। और यह बरेली के ही उदारवादी तथा सांप्रदायिक सदभाव की धरातलीय वास्तविकता को अहमियत देने वाले हिंदु समुदाय के लोग हैं जिन्होंने आज भी उस विशाल मंदिर में चुन्ने मियां की ंफोटो भगवान लक्ष्मी नारायण के साथ ही लगा रखी है तथा चुन्ने मियां की उस ंफोटो पर नियमित रूप से धूप,माला भी की जाती है। बेहतर होगा कि सांप्रदायिक सद्भाव के इस शहर में मेनका गांधी व आदित्य नाथ जैसे नेता सांप्रदायिक सद्भाव की ही मशाल लेकर जाएं ताकि बरेली  की सांझी गंगा जमुनी तहंजीब अपनी प्राचीन परंपराओं को ंकायम रख सके। बजाए इसके कि इन जैसे नेता बरेली व दूसरे अन्य शांतिप्रिय स्थानों पर जाकर किसी समुदाय विशेष को भड़काने तथा वहां की शुद्ध व सांफ फिंजा को ंजहरीला बनाने का यत्न करें।                                                            निर्मल रानी                                   

 

2 टिप्‍पणियां:

gita ने कहा…

किसी की बुरी नजर ना लगे कुछ तो उपाय होगा

gita ने कहा…

किसी की बुरी नजर ना लगे कुछ तो उपाय होगा